प्रश्नोत्तर P13-0163 · भाग 13
महाराज, आप कह रहे हो कि इसी में ढूंढ लो परमात्मा को, पर हमें तो उसकी जरूरत ही नहीं लगती — हम तो पैसे, गाड़ियां, बंगले ढूंढेंगे। और शरीर व आजीविका चलाने के लिए संसार में दूसरों से व्यवहार भी तो करना है। तो परमात्मा को क्यों ढूंढें?
ढूंढने से मुक्त होगा। परमात्मा अगर बाहर नहीं तो अंदर भी नहीं — अंदर-बाहर से परे है। क्योंकि अंदर भी एक दायरा है; अंदर-बाहर है तो दायरा है — ना अंदर, ना बाहर। मैं तो कह रहा हूं, देखिए, कुछ ढूंढने की जरूरत नहीं है। आपको जीवन मिला है; जीवन जीने के लिए इस संसार में दो रास्ते हैं — एक ईमानदारी-सत्कर्म, जिससे सबका हित होगा: आपका भी, समाज का भी, परिवार का भी; और दूसरा बेईमानी-दुष्कर्म, जिससे सबका अहित होगा। यही दो रास्ते हैं, चुनाव कर लो। ये फैसला आपके हाथ में है। यही मेन है — दो रास्ते हैं। प्रत्यक्ष ज्ञान के द्वारा अगर आपको समझ में आएगा तो पकड़ लो, लगन से उसमें काम करते रहो। समझ के निकलो, सीधी सी बात है। मैंने खोजने में जितनी मेहनत की, उतनी बांटने में कर रहा हूं। मैं अपना काम कर रहा हूं — जिसको समझना है समझ ले; ना समझे तो समझने की क्षमता मैं नहीं दे सकता। मेरा काम है बस बोलना।
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वीडियो: बिना सूचना के परिचितों के बीच में...! #yogijikasatsang · 2025-06-25