प्रश्नोत्तर P13-0068 · भाग 13
(एक साधक, परिवार के साथ) गुरु जी, मैं सत्संग भी समझता हूं, और गुटखा का सेवन भी करता हूं — यही चूक हो रही है। (पत्नी:) हम दो-तीन साल से बोल रहे थे पर बात नहीं सुनते थे; ज्यादा बोला तो गुस्सा करते थे, इसलिए छह महीने से यह टॉपिक ही बंद कर दिया।
छोड़ना है तो छोड़ दो — अभी, आज से त्याग करो; जेब में हो तो फेंक दो। कल करे सो आज कर। जीवन में थूकना हो तो चाटना मत, चाटना हो तो थूकना मत। एक तरफ हम सत्संग भी समझ रहे हैं, अध्यात्म को भी समझ रहे हैं, परिवार से प्रेम भी कर रहे हैं, और हम वो करते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए, जो हम चाहते हैं हमारे बच्चे न करें। नासमझी में करो तो ठीक है, लेकिन समझने के बाद भी कर रहे हो, तो अपराध हो गया। त्यागम् परम सुखम् — त्याग ही परम सुख है। क्या त्याग करना है? जो भी हमारे जीवन को अशांत कर रहा है, जिस वजह से परिवार में कलह हो रहा है, जिससे जीवन में तकलीफ आ रही है, उसका त्याग कर देना; और त्याग करो तो फिर मत अपनाओ। गुटखा से एक भी लाभ बता दो — यह एक गंदी आदत है; वही हमारा बेटा, पत्नी, बेटी खाए तो हम बर्दाश्त नहीं करेंगे, तो जो आप दूसरों से अपेक्षा रखते हो, वो देना चालू करो। इसे आपको ही खत्म करना है, और आंतरिक खत्म करना है, बाहरी नहीं — आंतरिक खत्म करोगे तभी लाभ होगा। कोई कहे पानी छोड़ दो, भोजन छोड़ दो, तो बोल सकते हो कि इसके बिना कैसे रहूंगा, लेकिन इसकी तो जीवन में कोई आवश्यकता नहीं है। आपने गुटखा छोड़ा, खुश वो लोग हैं — इतनी खुशी आप उन्हें वस्तुओं से नहीं दे सकते। हम सोचते हैं प्रॉपर्टी, वैभव बनाने में खुशियां हैं; नहीं, आपस में प्रेम से रहो, वो खुशियां हैं — कम से कम एक साथ भोजन तो करें। बहुत भाग्य से, आपके कर्म से, आपको धन, तन और ज्ञान मिलता है; अगर कोई ताकत मिली है, तो उसका सदुपयोग करो, दुरुपयोग मत करो। आने वाली पीढ़ी हमसे ही सीखेगी, तो वही काम करना चाहिए जिससे उसकी उन्नति हो, पतन न हो। सत्संग का मतलब है अपने आप को सुधारना — जैसे भोजन का मतलब है भूख मिटाना और शरीर को पोषण देना। सत्संग सुनो और अपने आप को सुधारो; जितनी भी बुरी आदतें हैं, उनका त्याग करो।
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वीडियो: मौन क्या है ? #योगी #मौन · 2026-07-02