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प्रश्नोत्तर P13-0065 · भाग 13

तो निर्विचार होना?

निर्विचार तो हो ही नहीं सकते। जितने लोग परम स्थिति को उपलब्ध हुए, उनके भी विचार आए, तभी तो अपने लिए भोजन मांगा, पता पूछा। भूख लगी, विचार आया — कहां भोजन मिलेगा, गए ना? अगर निर्विचार हो जाओगे, तो कोई पता पूछेगा तो बता भी नहीं पाओगे, कोई सामान रखकर भूल जाओगे। विचार स्वाभाविक आ रहे हैं; विचारों से परेशानी थोड़ी न है — विचारों में राग-द्वेष न हो। हम विचारों में राग-द्वेष में चले जाते हैं; परेशानी मूल राग-द्वेष की है, सारा खेल राग-द्वेष का है। आज तक हमने किसी भी व्यक्ति के बारे में निर्णय लिया तो राग में या द्वेष में — उसे अच्छा बताया या बुरा; अपने बारे में फैसला कर ही नहीं पाए। और वो तभी होगा, जब मान की इच्छा का त्याग करोगे, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करोगे, बड़ा बनने का भी त्याग, छोटा बनने का भी त्याग करोगे — बस मुझे जीना है, समाज में कुछ काम करना है; मेरा काम मुझे जो भी बना दे। अपने तरीके से जो उम्मीद बना रखी है, उसका त्याग करना है।

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वीडियो: कहते हैं ध्यान लगाओ ध्यान है क्या ? #योगी #ध्यान #meditation · 2026-07-01