प्रश्नोत्तर P13-0041 · भाग 13
गुरु जी, आपने कहा कि गुरु शरीर नहीं है, गुरु ज्ञान है। मेरे जीवन में कई संत-महापुरुष आए; आपसे पहले संत हरपाल सिंह जी को भी सुनता हूं, वे भी बिल्कुल आप जैसा बोलते हैं। तो मैं यह समझता हूं कि मेरा गुरु दो शरीरों में मुझे ज्ञान दे रहा है — कभी भटकता हूं तो आप पकड़ लेते हो, कभी वे।
गुरु तो ज्ञान का प्रतीक है। इस शरीर के लिए हमने कितने पात्रों में पानी पिया और कितने पात्रों में भोजन किया, याद है? अब अगर मैं संकल्प ले लूं कि एक ही पात्र में खाऊंगा, एक ही पात्र में जल पीऊंगा, तो कितनी तकलीफ होती। मुझे तो भोजन से, पानी से मतलब है, पात्र से क्या लेना-देना? मेरी प्यास पानी से बुझेगी, भूख भोजन से शांत होगी, पात्र कैसा भी हो। तो मुझे शरीर नहीं देखना है; जिस रूप-रंग का नाश होगा, उसे पकड़ लिया तो क्या? गुरु एक है, दो कभी हो ही नहीं सकता, और बिना गुरु सत्ता को धारण किए तुम्हारा कल्याण नहीं होगा। जैसे कोई पद पर था और रिटायर हो गया, उस पद पर कोई और बैठ गया, तो जो पद पर बैठा है उसकी साइन चलेगी — जो गया उसकी साइन लेकर बस पेपर लेकर घूमते रहो। इसलिए तो कहा गया, जीवंत गुरु खोजो, पहुंचा हुआ। जो पहुंचे, उन्होंने भी जीवंत गुरु को धारण किया, तभी पहुंच पाए; तो तुम्हें भी जीवंत गुरु को धारण करना पड़ेगा। हर काल, देश, परिस्थिति में गुरु मौजूद है — प्यासा मौजूद है तो पानी मौजूद है। तुम खोद नहीं पा रहे हो, वो तुम्हारी कमी है; 100 फीट पर नहीं, तो 1000 पर होगा, 2000 पर होगा। इसीलिए कहा गया, भ्रमण करो, तुम्हें गुरु मिल जाएगा, बस तुम उस लायक हो जाओ। जब मैं उसके शब्दों को धारण करूंगा, तब पहुंच जाऊंगा। एक ही व्यक्ति है जो आपको पहुंचा सकता है — वो आप; और एक ही व्यक्ति है जो आपको रोक सकता है — वो आप।
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