प्रश्नोत्तर P13-0036 · भाग 13
लोभ का अंश तो मेरे में बहुत ज्यादा है।
जिस चीज के लिए लोभ पैदा हो, उस पर काम ही मत करो। लोभ पैदा होते ही मार दो, खत्म हो जाएगा — उसे प्रतिक्रिया मत दो। प्रतिक्रिया दोगे तो पछताओगे; फिर लोभ, फिर प्रतिक्रिया, फिर पछतावा — तो कुछ नहीं होगा। लोभ पैदा होगा, मान पैदा होगा, लेकिन मुझे उसे सहायता नहीं देनी है। जिसके लिए लोभ पैदा हो, वो मुझे अब नहीं चाहिए; जिसके लिए मान पैदा हो, वो मुझे नहीं चाहिए। कोई भी वस्तु आए, तो पहले मैं अपने लिए सोचता हूं — यह मुझे प्रैक्टिकल में नहीं लाना है। अपने लिए नहीं देखना, दूसरे के लिए पहले कर देना; जो मैं अपने लिए चाहता हूं, वो दूसरों के लिए करूं। और अगर मैं कुछ चाहता हूं, तो मैं उसका क्या उपयोग करूंगा, क्या मेरी योग्यता है, मैं उसे कैसे हासिल करूंगा — क्या पूरी ईमानदारी से हासिल होगा? तब तो सदुपयोग करूंगा; बेईमानी से हासिल करूंगा तो दुरुपयोग होगा और मेरा पतन हो जाएगा। भाव ही मेन है, भाव के पीछे तुम हो। अगर यह शरीर हटा दिया जाए, तो इस संसार के लिए मैं कुछ नहीं हूं। तो 'कुछ नहीं' में जीना है, और 'कुछ नहीं' में तभी जी पाओगे जब मान और लोभ को हटा दोगे — इसको वैल्यू ही मत दो। ये खड़े होंगे, क्योंकि मान-लोभ के चक्कर में तो मेरा जन्म हुआ है, लेकिन इनको सहारा नहीं देना है। जरूरत में जीते हुए, ईमानदारी से जीते हुए, अपनी योग्यता के अनुसार जीते हुए, कैसे भी अपने आप को निकाल लेना है।
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