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प्रश्नोत्तर P12-0155 · भाग 12

इस आंतरिक मार्ग में गुरु की जरूरत कहां पड़ेगी?

गुरु शब्द है, वो आपको मिलता जाएगा — जैसे-जैसे आपकी योग्यता बढ़ेगी, वैसे-वैसे गुरु मिलता जाएगा। आप कहीं जाते हो, रास्ता भूल जाते हो, तो कोई बताने वाला मिल जाता है, वो कुछ दूर तक बताता है, आगे फिर कोई मिल जाता है; और अगर आप आगे जाओ ही ना तो आगे वाला नहीं मिलेगा। फिक्स करके यात्रा मत करिए कि मुझे कौन सा शरीर आकर बताएगा — जितनी दूर दिखाई दे रहा है उतनी दूर जाओ, आगे मिल जाएगा। व्यक्ति विशेष को मत पकड़ो, क्योंकि उस पिंड का नाश हो जाएगा; ज्यादातर लोग इसी में भटक रहे हैं। गुरु एक ही है — पूरी पृथ्वी में पानी आ रहा है, निमित्त नल अनेक हैं, पर पानी एक ही जगह से आता है; गुरु ज्ञान का प्रतीक है। पूछते जाओ, आगे बढ़ते जाओ, और तब तक पूछो जब तक समझ ना आए — किसी ने दूसरी भाषा में रास्ता बताया और आपने हां में हां कर दी, तो जाओगे कहां? ईमानदारी से कहना कि मुझे समझ नहीं आया, प्रकृति आपकी भाषा में बताने वाला मिलाएगी। अर्जुन कृष्ण के परम भक्त थे, फिर भी युद्ध के मैदान में बोले मैं युद्ध नहीं करूंगा, मुझे मेरे लोग दिख रहे हैं — जब तक ज्ञान नहीं हुआ, उन्होंने बात नहीं मानी; यही ईमानदारी उन्हें ज्ञान करवाती है, इसीलिए ज्ञान अर्जुन को हुआ, सबको नहीं। हम ब्रांडेड ढूंढते हैं, आवरण देखते हैं — पर देखना पात्र के अंदर क्या है, वो है। वेदांत का आखिरी शब्द है आवरण से अपने आप को मुक्त करा लेना, और हम आवरण वाले को पकड़कर एक और परत चढ़ा लेते हैं। भीड़ देखकर मत जाओ, समझ-समझ के आगे बढ़ो।

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वीडियो: कोई रास्ता दिखाओ... #योगी · 2026-07-12