प्रश्नोत्तर P12-0129 · भाग 12
मेरा आत्मचिंतन चल रहा है कि आज जो मुझे याद आ रहा है — किसी की याद, कोई स्वाद — उसका मतलब मैं उसे पहले जी चुकी हूं, और वो मेरा संस्कार बन गया। आप कहते हो उसे डिलीट करने की जरूरत नहीं, बस उसे कर्म में मत लाओ। तो यह किस तरह से काम करता है?
हम कोई ना कोई रस ही लेते हैं — पांच इंद्रियों द्वारा किसी से भी हम रस ले रहे हैं। और मुझे पता है कि इस रस से मुझे तकलीफ हो रही है, तो जितना मैं दूंगा उतनी तकलीफ बढ़ती जाएगी। तो मुझे देना बंद कर दो, वो करना शरीर से बंद कर दो। याद आएगी, घुटन होगी, सताएगा, क्योंकि रस लिया है — बेचैनी होगी, घबराहट होगी, उदासी रहेगी; दुख है, लेकिन खुशियां भी तो दे रहा था, तभी तो ग्रहण किया था। अब आपने देना बंद कर दिया, तो एक समय ऐसा आएगा कि वो अपने आप खत्म हो जाएगा, वो रस की इच्छा भी खत्म हो जाएगी। आप इतना नोट करो कि आप किसी के साथ जिए, किसी कारणवश वो छूटा; छूटने में यादें थीं, लेकिन अब आप कहीं शिफ्ट हो गए तो उसकी याद आती भी है तो कोई दुख नहीं, पीड़ा नहीं, मिलने की इच्छा नहीं। ये कैसे हुआ? क्योंकि आपने अपने आप को कहीं और शिफ्ट कर लिया और वो देना बंद कर दिया। यह दो कंडीशन में हो सकता है — या तो उसने मेरे अनुसार करना बंद कर दिया, या मैंने विवेक जागृत करके बंद किया। चाहे उधर से, चाहे इधर से, मिलना बंद हुआ ना, तो धीरे-धीरे वो खत्म हो गया।
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वीडियो: नया भरना बंद कर #योगी · 2026-09-13