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प्रश्नोत्तर P12-0120 · भाग 12

सारे दिन विचार और भाव चलते रहते हैं, और मैं अपने भाव के अनुसार उन्हें बल देती रहती हूं कि मेरी जिंदगी में ऐसा होना चाहिए। फिर जब वो परिणाम रूप में आता है तो मैं डगमगा जाती हूं, कर्म में भी डगमगा जाती हूं। तो मैं भाव में अपने आप को कैसे चेक करूं और उस भाव को कैसे दृढ़ करूं कि फिर वहां न हिलूं?

अगर आप कुछ मांग कर रहे हो, तो मांग करने में देश-काल-स्थिति-परिस्थिति अलग होती है, और जब मिलता है तो देश-काल-स्थिति-परिस्थिति चेंज होती है। तो अगर आपने कुछ मांगा है, तो जब मिले तब उसे ईमानदारी से यूज करो, छोड़ो मत। इसी को समझ लो कि अगर मैं आज मांग कर रहा हूं, तो अभी तो मिलेगा नहीं — कुछ चीजें अभी मिल जाती हैं, कुछ बाद में। तो आप देख लो कि उस समय देश-काल-स्थिति-परिस्थिति अलग रहेगी, तो क्या उसका उपयोग कर पाओगे या नहीं। करना ही हो तभी मांग करो, नहीं तो वहीं नाश कर दो कि नहीं चाहिए। हो सकता है आपने जिसके लिए मांगा, उस समय आपको जरूरत ही ना हो — लेकिन मांगा तो था ना। तो उसका उपयोग करो, कहीं और उपयोग करो। जैसे आपने भोजन मंगाया, और मिलते-मिलते भूख ही खत्म हो गई, या आने से पहले कुछ और ग्रहण कर लिया; लेकिन सामने वाला तो लेकर चला आया। तो उसका सदुपयोग करो — वो जरूरत में लाया, तब जरूरतमंद तक पहुंचाओ, नहीं तो खुद ग्रहण करो। उपयोग तो करना पड़ेगा, उससे भागना नहीं, नकारना नहीं; अगर नकार दिया तो उसकी भरपाई करोगे, उसका दंड मिलेगा। सदुपयोग कर दिया तो सबको मिलेगा — आपको भी, उन लोगों को भी। और दुरुपयोग किया, यूज ही नहीं किया, फेंक दिया, तो पीछे वालों को तो मिलेगा, लेकिन उसकी भरपाई आपसे ली जाएगी। क्योंकि जब कुछ भी मिलता है तो उसमें कितने लोगों की मेहनत है; ऐसे ही आप तक नहीं पहुंच गई। तो बहुत ही सूझबूझ के साथ जीना है।

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वीडियो: बिना हिसाब के तू जा नहीं पाएगा #योगी · 2026-09-17