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प्रश्नोत्तर P12-0108 · भाग 12

हम साधना के मार्ग पर आ गए हैं, लेकिन पुराने संस्कार बहुत बारीकी से काम करते हैं। कभी-कभी लगता है कि मैं पागल या मंदबुद्धि तो नहीं हो गई — दिमाग ही नहीं चल रहा, लिखना-पढ़ना भी छूट गया, बेचैनी और छटपटाहट टिकने नहीं देती। इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए?

पहले यह समझना बहुत जरूरी है कि ऐसा क्यों हो रहा है। जहां भी आप थे, वहां आपका अस्तित्व था और आपके अस्तित्व से सीधा काम होता था, तो लोग आपका नाम लेते थे। अब आप जहां गए हो, जिसके सानिध्य में हो, कुछ भी कर रहे हो — आपका नाम ही नहीं आ रहा। कर तो रहे हो; मंदबुद्धि हो जाती तो कर भी नहीं पाती। जो कार्य दिए गए हैं, वो आप आसानी से कर पा रहे हो। लेकिन उस कार्य में कोई आपका नाम नहीं ले रहा — अहम भाव को पोषण नहीं मिल रहा, कोई कह नहीं रहा कि आपने किया, तो छटपटाहट हो रही है। पहले लोग धन्यवाद भी देते थे; वो काम आप यहां भी कर रहे हो, लेकिन कोई धन्यवाद नहीं दे रहा। समाज उसका लाभ भी ले रहा है, लेकिन सीधा आपको पोषण नहीं मिल रहा, तो लगता है कहीं पगला तो नहीं गए। इतने समय से आपने वाहवाही ही तो बटोरी है। वाहवाही हम इसलिए चाहते हैं कि मेरा अस्तित्व बना रहे, मैं भी कुछ हूं। हमें यह देखना है कि हम किसके लिए आए हैं — हम तो अपने अस्तित्व को मिटाने आए हैं। तुम्हारा अस्तित्व किससे था? तुमसे नहीं, लोगों से था। अब यहां लोग तुमसे जुड़ ही नहीं रहे, तो लग रहा है मेरा अस्तित्व मिट रहा है। अस्तित्व मिटाने के लिए ही तो आए थे, तो मिटने दो — व्याकुलता क्यों?

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वीडियो: बिना हिसाब के तू जा नहीं पाएगा #योगी · 2026-09-17