प्रश्नोत्तर P12-0104 · भाग 12
मैं गृहस्थ हूं; बरसों से सत्संग सुनता हूं — रोज चार-पांच घंटे रामकृष्ण परमहंस जी को और एक घंटा आपको — इतना ज्ञान भर गया है, पर भीतर की अनुभूति के लिए एकांत चाहिए, जो घर-गृहस्थी में हो ही नहीं पाता। एकांत के लिए जाना चाहता हूं तो पत्नी और परिवार रोक लेते हैं, उन्हें डर रहता है कि कहीं गृहस्थी ना छोड़ दूं। क्या करूं?
आराम से रहो, जिससे आपका आत्मिक कल्याण हो वह कर लो। ना किसी को हमें छोड़ना है, ना किसी को पकड़ना है — दो में से एक करोगे तो फंस जाओगे; आत्मिक कल्याण में जो बाधा होगा, वह अपने आप छूट जाएगा। मैं भी यही कहता हूं कि अगर आप गृहस्थ हो, तो 12 महीने में एक महीना अपने आप को दो। अगर कोई रोकता है तो मत रुको; बोलो — मुझसे 11 महीने लो, लेकिन एक महीना तो मुझे दो; क्या मेरे जीवन पर इतना भी मेरा अधिकार नहीं? बताकर भी जाओगे कि आत्म कल्याण के लिए जा रहे हैं, तो कोई नहीं रोक सकता; कहीं ना कहीं आप कमजोर हो। मैं दुनिया का सौभाग्यशाली उसे समझता हूं जिसने अध्यात्म को समझा, और दुर्भाग्यशाली उसे, जो समझने के बाद भी यात्रा नहीं कर पाया। एक दिन ऐसा आएगा जब शरीर काम करने लायक नहीं रहेगा; जब तक इंजन में दम है, चाहे जिधर मोड़ दो। जवानी जहां बिताओगे, बुढ़ापे में वही चिंतन होगा। गाड़ी खरीदने से चलाना नहीं आ जाता; ज्ञान जमा करने से भी कुछ नहीं होगा — पता जानकर भी उस पते पर यात्रा नहीं की, तो वह पता एक दिन बोझ बन जाएगा, और जिंदगी भर पछतावा और घुटन रहेगी। अभी फैसला करो — गृहस्थ हो तो साल में एक महीना देना है, और अगर दायित्व-कर्तव्य से मुक्त हो गए हो तो पूरा देना है। नहीं तो प्लानिंग ही करते रहो; शरीर तो मिलता ही रहेगा।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 4 जनवरी 2026 #योगी · 2026-01-04