आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P1-0190 · भाग 1

चलेंगे तो पहुंच ही जाएंगे, लेकिन चलेंगे कब? क्या उसके लिए किसी धक्के की जरूरत है? हमें तो महसूस ही नहीं होता कि हमारी यात्रा हो रही है।

धीरे-धीरे आप समझेंगे तो चल ही देंगे — और चल रहे हैं; समझने में ही चल रहे हैं। परिणाम तो क्षण में आता है। आप समझ रहे हैं, इसका मतलब चल रहे हैं। कम से कम यह तो पता चला कि मैं कहां लिप्त हूं, यह छूट नहीं रहा — इसका मतलब छोड़ने का प्रयास हो चुका है। ऐसा नहीं कि आपकी यात्रा नहीं हो रही। इसको और गहराई से समझ लो, आज एकदम क्लियर कर लो — जैसे-जैसे आप समझ रहे हैं, वैसे-वैसे यात्रा हो रही है। कैसे? क्योंकि मुझे पता चल रहा है कि कहां-कहां मैं लिप्त हूं, किन आदतों में फंसा हूं; और यह भी समझ पा रहा हूं कि अभी इसे छोड़ नहीं पा रहा। लेकिन इसका मतलब है कि मैं छोड़ सकता हूं, और कभी न कभी छोड़ दूंगा। अगर समझ में आ गया है, तो कभी न कभी छोड़ ही दोगे। मैं समझ गया कि मैं इसमें लिप्त हूं और छोड़ना चाहता हूं पर छोड़ नहीं पा रहा, कहीं न कहीं मुझे इससे नुकसान है — तो एक दिन ऐसा आएगा, आप उसे छोड़ दोगे।

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वीडियो: मुझे दान चाहिए ही नहीं #योगी · 2026-10-04