प्रश्नोत्तर P1-0093 · भाग 1
गुरु जी, मेरा अपनी पत्नी से झगड़ा हो जाता है। मैं ज्यादा करना भी नहीं चाहता, फिर भी झगड़ा हो जाता है और बाद में अफसोस होता है। मार्ग दिखाएं।
झगड़ा इतना कर लो कि झगड़े के लिए कुछ बचे ना। जैसे कोई चीज आपको अखर रही है तो उसमें इतनी आग लगा दो कि वह जलकर राख हो जाए, और राख कभी जलती नहीं। तो इतना झगड़ा कर लो कि झगड़े के लिए कुछ बचे ना। हां, अगर आसपास लोग हैं तो चिल्लमचाली मत करना कि पड़ोसी परेशान हों; दूर चले जाना जहां कोई न हो।
ज्यादातर क्या होता है कि अगर कोई हमसे प्रेम करता है तो हम ओवर कॉन्फिडेंस में उसको ही जलील करते रहते हैं, बेइज्जत करते रहते हैं। लेकिन प्रेम करने वाला तो प्रेम ही करेगा, वह प्रेम करते-करते खत्म हो जाएगा। कोई ज्यादा केयर करे, देखभाल करे, तो हम उसे ही उल्टा-सीधा जवाब देते रहते हैं। फिर एक दिन वह या तो साथ छोड़ देगा या जिंदगी से चला जाएगा, फिर अफसोस होता है। तो देखो कहीं ऐसा तो नहीं है। बहुत सोच-समझकर जीवन जियो।
मैं पहले भी कहा हूं — प्यार से इतना प्यार कर लो कि प्यार किसी से प्यार करने लायक ना रहे। तो झगड़े से इतना झगड़ा कर लो कि झगड़ा किसी से झगड़ा करने लायक ना रहे। आखिर तक करना — निपटा देना या निपट लेना, मतलब झगड़े से। यह रोज-रोज का कोई मतलब थोड़ी ना है।
बातों को समझना। इस तरीके से बैठकर आपस में बातचीत कर लो कि आखिर झगड़े का विषय क्या है? कारण क्या है? हम क्यों झगड़ा करते हैं? क्या हम झगड़ा करने के लिए मिले हैं? आप बहुत समझदार बनते हो, बहुत पढ़े-लिखे हो, तो आप सोचोगे मेरे झगड़े का कारण क्या है। तो आप देख पाओगे कि झगड़ा बेमतलब का हो रहा है। तो वह चीजें छोड़ो और आगे बढ़ो। मेरा यह कहना है।
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