प्रश्नोत्तर P1-0037 · भाग 1
गुरुदेव, ईश्वर को याद करके बहुत रोना आता है।
कोई बात नहीं। बस यही भाव रखो कि मैं इस दुख के भवसागर से कैसे निकल जाऊं, और इसके लिए जो भी मुझे करना होगा, मैं तैयार हूं, करूंगा। कैसे राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, ‘मेरा’ और कर्ता के भाव से मैं अपने आप को निकाल लूं, कैसे भी इस दलदल से निकाल लूं — बस यही भाव बनाया करो।
जब भी आंसू आएं, यही भाव बनाओ कि हे परमात्मा, इस दुनिया को चलाने वाली कोई भी शक्ति हो — इसके पीछे किसी का तो हाथ है, कोई तो है — मुझे इतनी शक्ति प्रदान करें कि मैं कुछ करके यहां से निकल जाऊं। मैं अपनी पूरी ताकत अपने आप को निकालने में लगा दूंगा। मुझे अपना कल्याण करना है। मुझे मानव तन का मतलब समझ में आ गया है — इस तन के द्वारा उस परम सत्ता से मिलना है जहां से मैं हूं, जिससे मेरा अस्तित्व है; बनाए हुए अस्तित्व से अपने आप को मुक्त कराना है। मैं कैसे भी अपने आप को इस दलदल से निकाल लूं — बस यही भाव रखा करो।
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