प्रश्नोत्तर P1-0021 · भाग 1
गुरु जी, सादर चरण स्पर्श। आपकी एक बात बहुत सुंदर लगी — ‘जितनी बड़ी गठरी, उतनी बड़ी परेशानी’। मैं आपसे मिलने आना चाहता हूं, क्या आ सकता हूं?
मिलकर क्या करोगे? मिलने के पीछे कोई मकसद होना चाहिए। आज ही व्हाट्सएप पर एक संदेश आया कि हम आपके सान्निध्य में रहना चाहते हैं। मैंने पूछा, कितने समय से सुन रहे हो, क्या लाभ लिया? लाभ तो लिया। मेरे काम में क्या सहयोग किया? बोले, मैं सत्कर्म करता हूं, ईमानदारी से जीता हूं, मैंने मन आपको दे दिया। मैंने कहा, मन लेकर मैं तुम्हारा क्या करूंगा? ये बनावटी बातें छोड़कर सीधी बात करो — मेरे काम में कोई सहयोग दिया? बोले नहीं। तो मैंने कहा, तुम मेरे सान्निध्य के लायक ही नहीं हो। (सहयोग धन का या किसी कला-गुण से सेवा का हो सकता है — जैसे अभी यहां मिस्त्री की जरूरत है, कोई कहे मैं मिस्त्री हूं, तन से सेवा देना चाहता हूं, तो फटाफट आ जाओ।)
जिसे लाभ हुआ और उसने काम में कोई सहयोग नहीं दिया, वह तो सान्निध्य में रहकर और नीचे ले जाएगा, क्योंकि वह सिर्फ उपयोग कर रहा है। 1 लीटर पानी हो — आप निकालते रहो, डालो नहीं, तो एक दिन खत्म हो जाएगा, खाली पात्र बचेगा। तुम लोग ऐसे हो कि जिसके जीवन में जाओगे, खाली कर दोगे।
तो मैं कहना चाहता हूं कि आप दुखी क्यों हो, निराश क्यों हो? आपने जीवन भर लोगों को बस खाली किया है। देना भी पड़ा तो ज्यादा पाने के चक्कर में दिया। इसीलिए दुखी हो, क्योंकि उनकी बद्दुआ लगी। तुमने यह नहीं सोचा कि जितना लिया है, उससे ज्यादा दूं। काश तुम्हारा गणित यह होता, तो तुम दुखी, निराश, असहाय नहीं होते। तुमने यही सीखा कि मुझे फ्री में चाहिए, और दूंगा तब जब कोई ऑप्शन नहीं होगा — मजबूरी में देते हो। दुकानदार की नजर हट जाए तो बिना पैसा दिए निकल जाओगे। अपनी स्थिति को बदलो। जीवन में किसी से कुछ ले रहे हो, तो उससे ज्यादा देना सीखो। जिससे लाभ ले रहे हो, उसे ही नहीं दे पा रहे, तो सत्कर्म क्या करोगे?
बातों से बात बनने वाली नहीं है। प्रत्यक्ष में जियो और आगे बढ़ो, अपना आत्मिक कल्याण करो। मैंने आप लोगों के लिए अपनों की कुटिया में व्यवस्था कर दी है, वहां जाकर साधना करो। सान्निध्य का चक्कर छोड़ो, पहले सान्निध्य में रहने लायक तो बनो। आपकी योग्यता क्या है? योग्यता से ही तो परमात्मा मिलता है। इस दुनिया में शरीर की बनावट, रूप-रंग, धन, समझ — सब आपकी योग्यता के अनुसार ही तो मिला है। तो पहले देखो — क्या मैं सान्निध्य के लायक हूं? जिसका सान्निध्य चाहता हूं, उसके लिए मैंने क्या किया? मेरा यही कहना है — अपने अंदर यह भाव पैदा करो और कर्म में अपनाओ कि मैं जितना लूंगा, उससे ज्यादा ही दूंगा, सामने वाले को कभी कम नहीं दूंगा।
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